(रशीद क़ुरैशी)
महोबा में रेलवे क्रॉसिंग बंद करने के नाम पर जनता को दी गई ‘सौगात’ अब सिरदर्द बन चुकी है। रेलवे के अधीन बने दो अंडरब्रिज—एक बड़ा और दूसरा छोटा (उद्घाटन के दो दिन बाद डूबा)—दोनों ही बारिश में तालाब बनकर रह गए। ड्रेनेज सिस्टम की अनदेखी, घटिया निर्माण और ठेकेदारों की मनमानी ने न सिर्फ़ सरकारी ख़जाना लूटा, बल्कि सैकड़ों स्कूली बच्चों की जान को रेलवे पटरियों पर दाँव पर लगा दिया है। कही न कहीं जिम्मेदारों ने रेलवे को ‘विकास मॉडल’: के नाम पानी में करोड़ों रुपये बहाने का काम किया है

आपको बता दे कि महोबा रेलवे स्टेशन के पास पुरानी लेवल क्रॉसिंग को सुरक्षा कारणों से बंद कर दिया गया। यात्रियों की सुविधा का हवाला देकर सरकारी मशीनरी ने बड़ा अंडरब्रिज बनाने का ठेका दिया।
उद्घाटन हुआ, तारीफ़ें हुईं, लेकिन पहली मानसून में ही ब्रिज पर पानी घुटनों तक भर गया। बसें, ट्रक, ऑटो—सब फँस गए। राहगीर घंटों पानी में खड़े रहे। रेलवे के इंजीनियरों ने ड्रेनेज पाइप लगाना तो दूर, ढलान तक ठीक नहीं किया।
स्थानीय लोगो की माने तो
“रेलवे वाले आए, नेता आयेफोटो खिंचवाई और चले गए। कहा अब हम रोज़ सुबह ब्रिज देखकर साँस रोकते हैं—पानी भरा है या नहीं?
जनता के विरोध के बाद रेलवे ने बड़ा ब्रिज ठीक करने की कुछ मीटर दूर एक छोटा अंडरपास बनवाया। दोपहिया और चारपहिया के लिए अलग लेन, सब मगर पैदल यात्रियों के लिए कुछ नही खाका बनाया की किस तरह वह निकलेंगे। फिर छपास नेता आये फोटो खिंचाई सौगात मिली सौगात मिली कि आबाज बुलन्द की उद्घाटन किया चले गए

नतीजा थोड़ी ही बारिश ने इनकी सौगात और किस ईमानदारी से कार्य हुआ उसकी पोल खुद अंडरपास ने खोल दी वाहन फँसे, यातायात ठप हो गया और पैदल बाले स्कूली बच्चे हो या राहगीर पटरियों से गुजर कर जान जोखिम में डालकर घर पहुंचते है।
कुल मिलाकर दोनों अंडरब्रिजों में पैदल यात्रियों के लिए कोई व्यवस्था नहीं—न फुटपाथ, न रेलिंग, न रोशनी। नतीजा:
हर रोज़ स्थानीय लोग और स्कूली बच्चे जान जोखिम में डालकर रेलवे पटरी पार करते हैं।
