(रशीदक़ुरैशी)
महोबा शहर में 30 जनवरी को उस वक्त सियासी हलचल तेज हो गई, जब जल शक्ति मंत्री स्वतंत्र देव सिंह का काफिला अचानक रास्ते में ही रोक लिया गया। मंत्री अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यक्रम में शामिल होकर अन्य आयोजन के लिए रवाना हो रहे थे, तभी सैकड़ों लोगों और लग्जरी गाड़ियों के काफिले ने उनका रास्ता रोक दिया। कुछ ही देर में साफ हुआ कि यह कोई और नहीं, बल्कि उन्हीं की पार्टी के चरखारी विधायक ब्रजभूषण राजपूत हैं।

विधायक ब्रजभूषण राजपूत गाड़ी से उतरते ही मंत्री का घेराव कर अपनी विधानसभा की समस्याओं को सामने रखने लगे। सबसे बड़ा मुद्दा नमामि गंगे योजना के तहत बिछाई गई पाइपलाइन से जुड़ा रहा—टूटी सड़कों, अधूरे काम और समय पर जलापूर्ति न होने की शिकायतें गूंजती रहीं।
देखते ही देखते माहौल गरमा गया। मंत्री समर्थक और विधायक समर्थक आमने-सामने आ गए। सड़कों पर तू-तू, मैं-मैं के साथ विधायक और मंत्री के बीच भी तीखी नोक-झोंक देखने को मिली।
हालात बिगड़ते देख किसी तरह मामला शांत कराया गया। जल शक्ति मंत्री स्वतंत्र देव सिंह ने खुद विधायक का हाथ पकड़कर उन्हें अपनी गाड़ी में बैठाया। हालांकि घेराव और ज्ञापन देने के तरीके को लेकर दोनों पक्षों में जमकर कहा-सुनी हुई। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को सख्त रुख अपनाना पड़ा।
इसके बाद काफिला सीधे कलेक्ट्रेट पहुंचा, जहां पूरा प्रशासन अलर्ट मोड में दिखा। जिला भर की पुलिस तैनात कर दी गई, गेट बंद कर दिए गए और खास तौर पर मीडिया की एंट्री पर रोक लगा दी गई। कलेक्ट्रेट पूरी तरह छावनी में तब्दील नजर आया। अंदर एक-एक कर प्रधानों को बुलाया गया। जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक और प्रशासनिक अमला मौजूद रहा। करीब एक से दो घंटे चली बंद कमरे की वार्ता के बाद मंत्री का काफिला रवाना हो गया।
कुछ देर बाद विधायक ब्रजभूषण राजपूत प्रधानों के साथ बाहर आए और मीडिया से मुखातिब होते हुए बताया कि मंत्री ने 20 दिन का समय दिया है। अगर तय समय में समस्याओं का समाधान नहीं हुआ तो बड़े स्तर पर आंदोलन किया जाएगा। विधायक ने यह आरोप भी लगाया कि घेराव के दौरान मंत्री “ऑन द स्पॉट” गांव चलने को तैयार थे, लेकिन मौके पर नहीं गए।
इधर जिला प्रशासन ने सफाई दी कि नमामि गंगे योजना के तहत कराए गए कार्यों में जो भी शेष है, उसे जल्द पूरा कराया जा रहा है।

नोक-झोंक के बाद सियासी चर्चाएं तेज
इस पूरे घटनाक्रम के बाद सियासी गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म है। पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी सोशल मीडिया पर इस मामले को लेकर तंज कसा है।
कुछ लोग इसे 2027 के चुनाव से पहले सिम्पैथी बटोरने की रणनीति बता रहे हैं, तो पार्टी के भीतर ही यह चर्चा भी है कि इस तरह सार्वजनिक रूप से मंत्री का काफिला रोकना अनुशासनहीनता की श्रेणी में आता है—बात बैठकर भी की जा सकती थी।
एक और चर्चा यह भी है कि मंगरोल में अर्जुन राजपूत के यहां हुए बड़े आयोजन में मंत्री की मौजूदगी कहीं विधायक को नागवार तो नहीं गुजरी। वहीं सोशल मीडिया पर असली-नकली आईडी से एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप और अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल जमकर हो रहा है।
जो भी हो, इस घटनाक्रम ने महोबा को एक बार फिर प्रदेश की राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया है। सवाल यही है—
क्या यह 2027 से पहले का सियासी ट्रेलर है, या आने वाले दिनों में तस्वीर और भी साफ होगी?